Thursday, 4 May 2017

मंदिर में नवयुवक

मित्रों ,विगत दिनों मैं मंदिर गया था,आँखों देखी बात है मैंने मंदिर में विराजमान शिवलिंग के दर्शन किये,फिर मैं जब बाहर निकला तो फिलोस्फिक दृष्टिकोण से देखा तो लगा की कुछ लोग तो सच्चे मन से आते परंतु कुछ लोग केवल और केवल रंगिलियां देखने आते है।ज्यादातर अब जहाँ तक मैंने देखा है तो नवयुवक आज के जमाने के अनुसार प्रेम प्रसंग के चक्कर में मंदिर में आना जाना लगा रहता है। मैंने एक युवक को देखा जो बढ़िया,तिलक लगाये हुए,बना-ठना था,परंतु वो केवल मुझे स्मार्ट दिखने का प्रतीक लगा। पूजा बेमन से कर रहे थे पर उनकी नजरे रंगिलियों पर थी।चार पंक्तियाँ मेरे मन में इसी बात पर उमड़ी जो आप सभी तक निवेदित-

आँखों देखी मनचलों की दशा,
तो लगा मंदिर में घोर पाप होता है।
कैसे हो भला इस भारत देश का जहाँ,
तिरछी नजरों से ईश्वर का जाप होता है।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.न.-9560802595,9628368094

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