Wednesday, 29 November 2017

नगरीय निकाय चुनाव पर कविता

स्वारथ खातिर लोग कुछ,आ करते पहचान।
जिन लोगों ने आज तक,किया नहीं सम्मान।।

किया नहीं सम्मान,कहो किस दम पर लड़ते।
पकड़ लिया मैदान,किन्तु है पैर उखड़ते।।

जनता का दिल जीतो,पहले करिये परस्वारथ।
जीते तभी चुनाव,सफ़ल होगा निजस्वारथ।।

सुख-दुःख में जो काम आता,उसको ही हमें जिताना है।
मतलब परस्त बस मौके पर,बुनते हर ताना-बाना है।।

किन्तु जनता सब कुछ देखती,सुनती-समझती है;
जो तन के उजले-मन के काले,उनको बन्धु हराना है।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं.-9628368094,7985502377

Wednesday, 15 November 2017

नमो 2019

गुजरात की दशा देखकर,होश हो रहे दंग।
मोदी जी को लग रहा,हारेंगे हम जंग।।
हारेंगे हम जंग,शुरू हो उलटी गिनती।
हारे आप चुनाव,कर रही जनता विनती।।
फिसल हिमाचल रहा,न बनने वाली बात।
दिल्ली को फिर छोड़कर,भागोगे गुजरात।।

अगर आप है हारते,हिमाचल-गुजरात।
तब तुमको मालूम हो,मोदी जी औकात।।
मोदी जी औकात,दिखाए जनता पिछड़ी।
मोदी-योगी-राजनाथ ने,खूब पकाई खिचड़ी।।
दो हज़ार उन्नीस में,करो राम का जाप।
बातों में भरमा रहे,भोली जनता आप।।

केवल वादों से नहीं,भरने वाला पेट।
भोली जनता का सभी,करते है आखेट।।
करते है आखेट,दे रही जनता गारी।
बंद किया अनुदान,सब्सिडी की तैयारी।।
मजदूर-किसान-कर्मचारी,दे तुम्हें न सम्बल।
नेता बन प्रतिपक्ष,सदन में बैठो केवल।।

घूमें देश-विदेश पर,नहीं सपारे आप।
विषधर काला नाग है,पाक सभी का बाप।।
पाक सभी का बाप,न करता किसी से मेल।
मौका पाते ही तुरत,देता सबको पेल।।
मचा रहा आतंक,खुशी से फिर भी झूमें।
बदल सके न आप,नतीजा क्या है घूमें।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं.-9628368094,7985502377

Sunday, 8 October 2017

करवाचौथ पर कविता

नवदुर्गा व्रत पूर्ण कर,माँ से मांगू माँग।
माँ गौरी कृपा करो,कर दो अमर सुहाग।।
भरी माँग से मांगती,दे दो माँ सिंदूर।
अमर माँग मेरी रहे,भले पति हो दूर।।
उमा-महेश-गणेश,व्रत करवाचौथ महान।
पत्नी का सौभाग्य है,पति भगवान समान।।
हँसकर के सब कुछ सहे,किन्तु न पति बिछड़े।
भूखी प्यासी रहे,सहे सब गम अरू दुखड़े।।
हो सारे गम दूर मिलें जब,सजन-सजनिया।
इंतजार के बाद,खिले जब गगन चँदनिया।।
पूजन करे गणेश का उमा-महेश मनाय।
दर्शन करके चंद्र का,दे जल अर्घ्य चढ़ाय।।
सुहागिनों की शान है,माँग भरा सिंदूर।
"दीपक"जब तक जल रहा,हो प्रकाश भरपूर।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं.-9628368094,7985502377

Saturday, 30 September 2017

विजयादशमी/दशहरा पर कविता

काश!हम विजयादशमी कुछ;और खास मना पाते।
रावण के साथ साथ;उन दानवों को भी मिटा पाते।।

बलात्कारियों के भीतरी रावण को;आग लगा दे।
नारी की आन-शान खातिर;अपनी जान लुटा दे।।

राम-कृष्ण के नाम रख;लोग करते गंदे काम।
कलयुग में अब राम का हुआ है नाम बदनाम।।

आज सभी भोग में लिप्त है;चाहे योगी हो महंत।
इस प्यारी भोली जनता को भी;भटकाते है संत।।

सिर्फ पुतलों के ही दहन का;चल पड़ा है रिवाज।
नारी की इज्जत लूटे जो;उसे जला न सका समाज।।

कहना"दीपक"का मान;वरना नैया पहुँचेगी जब मजधार में।
बचाने वाला कोई नहीं होगा;और न ही दम रहेगी पतवार में।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.-9560802595,9628368094

Thursday, 21 September 2017

नवरात्रि पर कविता

आये है नवरात्र के दिन;करूँ माँ का पूजन अर्चन।
आते माँ की शरण में है सब;हो सज्जन चाहे दुर्जन।।
आजा तू भी शरण में ;कर माँ का वंदन बन्दे।
भाग्य तेरे जाग जायेंगे;कटे सब कष्टों के फंदे।।

नौ दिन,नव रूप लिए,है आयी माँ दुर्गा हरने पाप।
काली बन संहार करे जब,तब असुर है जाते काँप।।
फिर भी मनुज तू स्वार्थ में अँधा,कर रहा है गलतियाँ;
बेटे की झूठी आस लिए,बेटी को है माने अभिशाप।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं-9628368094,7985502377

Sunday, 6 August 2017

काश! बहन होती मेरी,मैं भी राखी बंधवाता

काश!बहन मेरी होती,मैं भी राखी बंधवाता।
अपनी प्यारी बहना को,मैं भी दुलराता।।

किस्मत वाले है वो भाई;
बहन का प्यार,जिन्हें मिलता है।
ख़ुशी हो या गम उनको
अहसास उन्हें होता है।।
रूठ अगर वो जाती मुझसे,उसको फिर मैं मनाता।
काश!बहन मेरी होती★★★★★★★★★।।

रिश्ते है कई दुनियाँ में,
पर ये रिश्ता कुछ खास है।
बहनों के लिए राखी,
धागा नहीं विश्वास है।
सूनी न कलाई मेरी रहती,मैं भी भाई कहलाता।
काश!बहन मेरी होती★★★★★★★★★।।

प्यारी बहना को अगर,
कोई रावण सताता है।
बहना का एक ही बस,
भाई सहारा होता है।।
मरते दम तक"दीपक"भी अपना फर्ज़ निभाता।
काश!बहन मेरी होती★★★★★★★★★।।

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं.-9628368094,7985502377

Monday, 24 July 2017

बेटे!कभी निराश न होना

मित्रों,यह कविता उस पिता पर लिखी है जो अपने बेटे को कभी निराश नहीं देखना चाहता,और साहस से हर चीज को हासिल करने के लिए कहता है...ऐसे पिता को मेरा नमन!... पंक्तियाँ प्रस्तुत है-

बेटे!कभी निराश न होना।
चाहे जितना अंधकार हो;

पर प्रकाश की आस न खोना।।

बेटे!कभी निराश न होना।

जीवन तो संघर्ष क्षेत्र है,
जब तक जीना तब तक लड़ना।
वह जीना भी क्या जीना है,
जिसमें पड़ता पांव पकड़ना।।
तुम आने वाले जीवन में;
आंसू से मुंह कभी न धोना।
बेटे!कभी निराश न होना........२

आंधी आती है आने दो,
घूमड़ घटाएं गिर जाने दो।
तुम अपना साहस मत छोड़ो,
बाधाओं को धमकाने दो।।
कांटो पर चलकर ही मिलता;
है फूलों का नरम बिछोना।
बेटे!कभी निराश न होना........२

एक लक्ष्य निर्धारित करना,
फिर प्रयत्न के बाण चलाना।
तुम ऐसे मुस्काना तुमसे,
कांटे तक सीखें मुस्काना।।
तुम सदैव अपनी माला में;
भांति-भांति के फूल पिरोना।
बेटे!कभी निराश न होना........२

रचयिता-कवि कुलदीप प्रकाश शर्मा"दीपक"
मो.नं.-9628368094,7985502377